Monday, February 14, 2011

Winter

देखी कल रास्ते मे पड़ी
ठिठुरती वृद्धा की आँखे,
याचना करती कातर
दयनीय आस भरी
गर्म लिहाफ़ो मे लिपटे
काठ के पुतलो को देखती
उनके साथ ऊनी कपड़ो मे लिपटे
कुत्ते के पिल्ल्ले
या फिर बिल्ली के बच्चे
व्यंग से भरी कभी सोचती आँखे
कितनी बदल गयी है ये दुनिया
काश वे ना होती मानव की आँखे
अगले कुछ पलों मे वे
नही थी देखने मे समर्थ
पर कुछ प्रश्न जगा रही थी आंखे

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