Friday, October 26, 2012

प्रकरण 3 : सुख दुःख विवेक

सुख और दुःख शब्दो का प्रयोग हम लोग हर समय करते है. परन्तु कितने अच्छे से हम इन शब्दो का अर्थ जानते है? आप संभवतः हन्से और कहे कि भाई कौन सुख और दुःख का अर्थ इस संसार मे नही जानता?

अच्छा, यह तो सही है कि जब कोई वस्तु हमे चाहिये और वो ना मिले तो दुःख होता है.  और जब मिल जाये तो सुख. अस्तु, अब हम ये मानते है उदाहरण के लिये कि आप जन्गल मे भटक गये और रात होने वाली है, आप थके हुए और भूखे भी है. आप चलते जा रहे है ऐसी परिस्थीति मे आपको एक झोपडी दिख जाती है जहा कुछ प्रकाश है. आप की आशा बन्धती है. आप अन्दर जाते है और घर के मालिक को बताते है आपकी परिस्थिति, और उससे निवेदन करते है कि वो आपको रहने को जगह और कुछ खाने को दे. वो गरीब आदमी आपको कुछ सूखी रोटिया और प्याज देता है. बाद मे वो एक फटी हुइ चादर देता है सोने को. आप क्या अनुभव करते है? सुख या दुःख? अब ये तो सुख ही है की आपको इतने घने जन्गल मे सोने को  स्थान और खाने को कुछ मिला.

अब अगर मान लिजीये ऐसा कुछ नही हुआ था. आप अपने घर पर आराम से  TV देख रहे है और हम आपके घर पर आकर पहले उदाहरण वाले झोपडी का चित्र दिखाते है, और कहते है की आपको वहा रह कर वहा की सूखी रोटी खानी है. आप क्या करेन्गे ? संभवतः हमे मार कर घर से निकाल दे ये कहते हुए कि तुम पागल हो गये हो. अगर मान लिजीये की आपकी परिस्थीति ही ऐसी हो गयी कि आपको वास्तव मे आपका घर छोड कर वहा रहना पडे तब? तब आपको दुःख होगा या सुख? तब आपको दुःख होगा की शहर का इतना अच्छा घर छोड कर आपको कहा आना पड गया. तो क्या हम ये कह सकते है कि सुख एक सापेक्ष अनुभव (relative experience) है, जो काल और परीस्थिति के साथ बदल जाता है?

 तो एक यह कि सुख और दुःख सापेक्ष है और दूसरा कि बहुत से सुख  (या सारे?) किसी अभाव के समाप्त होने पर होते है. जैसे जब हमे प्यास  लगती है तब जल सुख देता है.  जब भूख  लगती है तब भोजन सुख देता है.  अर्थात अगर हमे किसी वस्तु  कि तृष्णा हो और वह वस्तु मिल जाये तो सुख की प्राप्ति  होती है.  तो अगर हमे कुछ प्रयत्न करके इस तृष्णा तो समाप्त कर ले तो हमे नित्य सुख की ही   प्राप्ति हो जायेगी. तो हमारे सन्यासमार्गी ग्रन्थ यही कहते है. वो कहते कि किसी प्रकार से हम ऐसी वस्तुओ से दूर हो जाये जो  तृष्णा पैदा करती हो तो हमारे पास सुख ही  सुख रह जायेगा. ये पन्थ कहते है कि संसार से दूर जन्गल चले जाओ और मस्त रहो. परन्तु सुख क्या केवल तृष्णा से पैदा होता है? क्या सुख तभी पैदा होता है जब हम किसी वस्तु की इच्छा करते है और वो वस्तु हमे मिल जाती है?  किसी बच्चे के मुह मे  मिश्री डाल दो तो क्या उसे सुख नही  होता? तब क्या उसे उस मिश्री नही मिलने से उसे दुःख हो   रहा था? ऐसे बहुतसे उदाहरण मिल  जायेन्गे जहा सुख तो है पर उससे पहले तृष्णा नही थी.

तो तृष्णा की पूर्ण अनुपस्थिति नित्य सुख है या नही? किसी ऐसे बहुत धनी व्यक्ति का उदाहरण ले जिसने कभी अभाव  ना देखा हो और सुख के सारे साधन उसके पास उपलब्ध है. अर्थात उसे कभी भी तृष्णा का अनुभव ही नही हुआ. तब क्या यह कहा जाये की उसे कभी किसी दुःख का अनुभव नही हुआ? या कभी उसका मन किसी बात से अशान्त नही हुआ? तो हमारे ध्यान मे आता है कि  ऐसा संभव नही है. सारी सुख सुविधाओ के बाद भी हमे क्रोध होता है, हमारा मन अशान्त होता है और हमे दुःख होता है.  जब साईकिल चलाते चलाते हम स्कूटर चलाने लगते है तो हमे सुख होता है और जब कार चलाते चलाते स्कूटर चलाने की परिस्थिति  हो  तो हमे दुःख होता है.

दो बाते  सिध्द है, एक बात कि एक हि वस्तु या  क्रिया ( human transactions as explained by psycologists) अलग अलग  परीस्थितियो मे सुख या दुःख दे  सकते है.

दूसरी बात ये कि दुःख और सुख दोनो का अपना अलग अस्तित्व है. ये बात पुरी सही नही है कि सुख और दुःख तृष्णा के समाप्त होने पर  या नही होने पर  आश्रित है.  तब सन्यास ले कर तृष्णा समाप्त होने पर भी सुख या दुःख का  चक्कर समाप्त हो जाये ये आवश्यक नही है. तब नित्य सुख का साधन क्या है. और क्या नित्य सुख जैसी कोई स्थिति है या नही?

हम जानते है कि हमे दो प्रकार के सुख और दुःख होते है, एक तो शारीरिक और दुसरा   मानसिक.  अगर हम  थोडा ध्यान दे तो सारे सुख और  दुःख  को अनुभव करने के लिये हमे मन / बुद्धि कि आवश्यकता होती है. अगर हमारी  इन्द्रियो का  हमारे दिमाग से संबन्ध ना रहे किसी कारणवश, तो हमे कोइ शारीरिक सुख या दुःख का अनुभव नही होगा.  तब यह कहना कि सारे सुख और दुःख मन / बुद्धि मे ही अनुभव  किये जाते है, गलत न होगा. अगर हम किसी तरह से मन को साध ले तो हम इन दुःखो को कम करते है क्या?

बहुत से अपने महापुरुषो ने संतोष (तुष्टि) ये साधन बताया है मन को साधने का. उसके साथ ही  ध्यान और योग के द्वारा हमे मन  शान्त  करने के साधन ज्ञात है.  वर्तमान मे योग और ध्यान के प्रति लोगो की रुचि बडी है. 

तुष्टि या संतोष एक सुन्दर विचार है, लेकिन हमारे यहा  आशीर्वाद के संकल्प मे हम कहते है "शान्तिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु". केवल शन्तिरस्तु नहि कहते. अर्थात हमे शान्ति और तुष्टि के साथ पुष्टि या प्रगति  भी चाहिये.  अगर संसार के सारे वैज्ञानिक कहे कि हमे अब तक के आविष्करो से संतोष हो गया या उद्योगपति कहे कि अब नये उद्योगो कि आवश्यकता नही तो हमारी सारी प्रगति रुक जायेगी. हो सकता है हम समय मे पिछे चले जाये. तो स्पष्ट है कि  हमारे जीवन का ध्येय कोरा सुख नहि  वरन प्रगति भी है.  सो हमारे  जीवन का ध्येय प्रगति और विकास है. प्रगति संसारिक उप्लब्धियो मे और विकास मानसिक सुख मे.

अब   थोडा पुनरावर्तन (revision )   करते है. हमने देखा कि सुख या दुख का अनुभव मन ही करता है, अर्थात सुख का अनुभव सापेक्ष है. दुसरा कि सुख और दुःख का स्वतन्त्र अस्तित्व है.  तब सुख हमेशा सुख नहि रहता और सारे सुखो के साधन होते हुये भी कोइ व्यक्ति दुःखी हो सकता है.  तब ऐसा ध्यान मे आता है कि संसार मे दुःख, सुख से अधिक अनुभव किया जाता है. जितना सुख मिलता है उसकी तृष्णा मे भी वृद्धि होती है. फिर अगर सुख मे वृद्धि नहि हुई तो मन को दुःख होता है. 

अगर हम ध्यान दे तो मालूम होगा कि हमे दुःख केवल इसलिये होते है क्युकि हमारे मन मे हर काम के परिणाम कि एक अपेक्षा होती है, एक चित्र होता है हमारे मन मे. हमारे मन मे एक कल्पनाओ का एक संसार होता है. यदि वो अपेक्षाये पूर्ण नही होती और वो कल्पनाओ के संसार से मेल नही खाती, तब हमे दुःख का अनुभव होता है.

हम सारे कर्मो का अपने मन के अनुसार परिणाम चाहते है. जब ऐसा नही होता तब हमे दुःख होता है. जब हम कर्म क्या और कैसे करना है उसका विचार छोड कर कर्म के फल का विचार करते है और जब हमे वैसा फल नही  मिलता तब हमे दुःख होता है. केवल एक उदाहरण ले. जब कोई विद्ध्यार्थी परीक्षा के भय से यही विचार करता रहे की वह तो असफल हो जायेगा और उस डर से वो तयारी नही करे. तब यह अनुमान लगाना कोइ कठिन नही कि वह विद्धार्थी परिणाम आने तक तो दुःखी रहेगा ही, वरन उसका परिणाम भी अच्छा नही होगा.

तब सुखी रहने का साधन है कि खुद को परिणाम से अलग करके केवल कर्म कैसे करे उसका विचार करना चाहिये और फल को कृष्ण पर छोड देना चाहिये.  हम हमारे विकास के लिये कर्म तो करे क्योकि वह हमारा धर्म है.  परन्तु उसके परिणाम से दुःखी ना हो.

कृष्णाप्रणमस्तु एक बहुत शक्तिशाली मन्त्र है.