Saturday, November 3, 2012

वर्तमान

लिखू या ना लिखू के कितने सवाल है.
आज प्रेस मे मिडीया मे सवाल ही सवाल है.
किसी ने किसानो की जमीन ले ली
किसी ने खाये अपाहिजो के उपकरण  यह बवाल है.

कोइ गुस्सा है, कोइ हसता है
कोइ प्रेस मे लडता  है
कोइ सडक पर उतरता है
किसी का केस दर्ज करने  का खयाल है.

कौन है सच्चा कौन है झूठा
कौन है किससे बडा ईमानदार
कौन  है  सबसे बडा बेईमान
इस पर भी सवाल है

इन सब सवालो से बडकर
बुनियादी और जमिनी हकीकत पर
क्या जनता को कुछ हासिल होगा?
इस सारे हन्गामे का क्या होगा हासिल ये सवाल है.

Friday, November 2, 2012

अधूरा शहर

आधा अधूरा  सा आदमी
जिन्दगी ढोये जा रहा है,
इस अधूरे शहर मे.
कचरे के गतठ्ठे सी जिन्दगी
हर कदम पर कुछ गिरती हुई,
सांस लेने कि मशीन सा आदमी,
हर कदम पर जिसकी सांस उखड़ती हुई.
या एक कमाने का कारखाना
बना हुआ है  आदमी
कमा रहा है और हर साल
बड जाती है आमदनी.
हर साल कुछ नये परदे
य एक नया कारपेट्
घर ला कर खुश हो जाता है.
परदे और कारपेट् मे उलझ गयी है
अधूरे आदमी की अधूरी जिन्दगी.
सृजन भूल सा गया है
या नही है फुर्सत उसे
लोकल मे रोज धक्के खाने से.
समय है सिर्फ़ रईसो के पास
शहर मे समय भी गोया
कीमती जिन्स हो गया है.
यहां आदमी होना जरूरत नही
विलासिता का एक शौक हो गया है.

सूरज

हर सुबह मा के नारन्गी आन्चल से
                  आसमान मे निकलकर
माथे की गोल बिन्दी सा हो जाता है.
ठेकेदार सा सबको काम बाटता है          
                  गुस्से सी  गरम दोपहर मे
सिर पे खडा मालिक सा काम कराता है.
हर शाम  आसमान को विधवा सा कर
                   ओस के आन्सू बहाने
रातो मे सिसकता छोड जाता है.