Sunday, September 16, 2012

Prakaran 2: Aadhibhautik Sukhwaad

पिछले प्रकरण मे हमने देखा कि हमारे यहा प्राचीन ग्रन्थो मे कर्म जिज्ञासा शान्त करने की पद्धतियो पर विचार करके उन्हे तीन वर्गो मे विभाजित (divide) किया है, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक. इन तीनो मे आध्यात्मिक विचार पद्धति सर्वश्रेष्ठ बतायी गयी है. जब अर्जुन को कर्म जिज्ञासा उत्पन्न हुइ कुरुक्षेत्र मे, तब श्रीकृष्ण ने उसे इसी पद्धति से विचार करने को कहा.  किन्तु केवल इसी से यह निर्णय लेना कि यही विचार पद्धति सर्वश्रेष्ठ है, ठीक नही है. बहुत से पाश्चात्य विचारको ने आधिभौतिक सुखवाद पर बहुत विचार किया है और बहुत से उपयोगी सूत्र 
प्रस्थापित किये है. इनका विचार हम यहा करेन्गे.
हमारे शास्त्रो मे भी आधिभौतिक सुखवाद् के बहुत से उदाहरण है.  चर्वाक् (जिन्होने कहा है, यावत जीवेत सुखेन जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत), जबाली का राम को उपदेश आदि इसके उदाहरण है. महाभारत मे वर्णित कणकनीति भी इसी प्रकार की है.  चार्वाक महोदय  का मत है की पञ्चमहाभूत अपने ही से मिल लेते है और आत्मा का निर्माण हो जाता है. यह आत्मा शरीर नष्ट होने के साथ ही नष्ट हो जाती है.  इसलीये आदमी को धर्म परोपकार आदि के चक्कर मे समय नष्ट ना करके इन्द्रीयो का सूख भोग जमकर कर लेना चाहिये.  यदि अर्जुन को इस पन्थ का कोई व्यक्ति मिल जाता, श्रीकृष्ण की जगह, तो वो बतलाता की अरे तु ये धर्म अधर्म क्यो ले कर बैठा है? जा इन सबको मार और फिर सुख से राज्य कर. किन्तु इस प्रकार का प्रकट स्वार्थ कुछ संसार मे चलता नही. आप हमेशा स्वयम् को संसार के केन्द्र मे मानकर यहा सुख की कामना नही कर सकते. सुखवाद ]की इस पद्धति पर अधिक   विचार की कुछ आवश्यकता नहि है. किंबहुना इसे नितिशास्त्र कहना भी गलत होगा.
हम सुखवाद के बाकी विचारो की अब समीक्षा करेन्गे. सुखवाद् के बहुतेरे और विकसित विचार पाश्चात्य विचारको ने किये है. इन विचारो का अवलोकन करने पर यह ध्यान आता है कि मोटे तौर पर चार प्रकार के सुखवादी विचार है.

1. केवल स्वार्थी :  हम इसका उल्लेख ऊपर कर चुके है. और यह निर्विवाद है कि केवल स्वार्थी सुखवाद संसार मे नही चल सकता.

2. दूरदर्शी स्वार्थी : कुछ पाश्चात्य विचारको ने यह नीतिशास्त्र प्रतिपादित किया है जो वास्तव मे पाश्चात्य नीतिशास्त्र का प्रारम्भ माना जा सकता है. इन विचारको मे इन्ग्लण्ड के होब्स और फ़्रान्स के हेल्वेशियस प्रमुख है.  इस विचार पद्धति मे ये आधारभूत तत्व है कि मनुष्य स्वार्थ के साथ दूसरो का भला भी करता है किन्तु वो ऐसा सिर्फ़ किसी स्वार्थ के कारण ही. तो अगर मा बच्चे को दूध पिलाती है क्योकि उसमे उसका स्वार्थ ये है कि बच्चा बडा होकर उसका ख्याल रखेगा. परन्तु थोडा ध्यान देने से ही ये पता चलता है कि मनुष्य ऐसे बहुतेरे काम करता है जिसमे उसका स्वार्थ नही होता. जैसे कोइ अपने बच्चे के लिये अपना जीवन दाव पर लगा देता है. मनुष्य के मन मे दया करुणा जैसे भाव होते है और जिनमे स्वार्थ नही होता.  इस पध्दति का विरोध बतलर जैसे युरोपीअन विचरको ने भी किया था. तब हमे ये कहना पडेगा की ये विचार पध्दति सही नही है. आज इस पध्दति को मानने वाले कोइ युरोप मे भी नही है.

3. ऊभयवादी स्वार्थी : इसे हम बुद्धिमान स्वार्थ भी कह सकते है. इसे मानने वाले मानते है कि मनुष्य कुछ काम बिना स्वार्थ के करता है. परन्तु ऐसा वो अपने स्वार्थ की पहले रक्षा करने के बाद करता है. आज के समय मे लोग अवश्य मानते है कि ये विचार पद्धति सही है. अब इस पर थोडा विचार करे. मान लीजिये हम सेना मे है और किसी देश ने हम पर आक्रमण किया, तब क्या हम इस डर से लडायी मे हिस्सा नहि लेन्गे कि हमारा तो स्वार्थ खुद के प्रान बचाने मे है.  ऐसे बहुतेरे उदाहरण दिखते है जहा हम अपने स्वार्थ के परे जा कर कुछ  कर्म करते है जो हमारे  स्वार्थ के विरुद्ध होते है. तब ये भी पध्दति इसका निर्णय लेने के लिये ठीक नहि कि किसी परिस्थिति मे कौन सा कर्म करना चाहिये.

4.बहुमत का सुख  : कुछ विचारको ने स्वार्थ  के परे जा कर विचार किया है. इन विचारको ने प्रतिपादित किया है कि सही नीतिशास्त्र कि पध्दति यह  है कि  ऐसा कर्म करे जिससे सबसे अधिक  लोगो का हित हो.  The larger good. अब अगर बहुमत का हित निर्णय लेने का आधार हो तो बडी मुश्किल हो जायेगी. महाभारत युद्ध मे कौरव सेना अधिक संख्या मे थी. तब तो हमे कहना पडेगा कि पाण्डवो कि हार हो जानि चाहिये थी. तब अगर ये भी सही मापदण्ड नही है तो क्या रास्ता चुनना होगा?

क्या अपना सुख अन्तिम लक्ष्य है? या कुछ और भी विचारणीय तत्व है कर्म का निर्णय लेने को?

व्यास जी महाभारत मे कहते है कि

न जातु कामान्न भयान्न लोभद्धर्म त्यजेज्जीवितस्यापि  हेतोः|
धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नि यो  हेतुरस्य त्वनित्यह्||

अर्थात  सुख दुःख अनित्य है परन्तु धर्म नित्य है, इसलिये इच्छा से, भय से, लोभ से अथवा प्राण संकट मे आने पर भी धर्म नही  त्यागना चाहिये.

तब हमे सुख दुःख के यथार्थ स्वरूप का विचार करना होगा और समझना होग कि क्या कोइ नित्य सुख है? इस सुख दुःख विवेक का विचार हम अगले प्रकरण मे करेन्गे.

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