Monday, September 10, 2012

Prakaran Ek : Jigyasya

जब से मनुष्य कि उत्क्रान्ति (evolution ) हुइ है और हम बन्दरो से मानव बने है, हमारे मन मे जिज्ञासा का एक शाश्वत भाव रहा  है. इसी जिज्ञासा के कारण हमने आविष्कार किये और एक उन्नत मानव समाज कि रचना की. मेरे विचार मे आवश्यकता इन आविष्करो कि जननी नही थी. अगर आवश्यकता जननी होती तो हम आज TV या Mobile का उपयोग नही कर रहे होते.  साथ साथ हमारे मन मे भिन्न प्रकार के विचार जो परा भौतिक प्रकृति के आते है वो नही होते.

ऐसी ही जिज्ञासा है कर्म जिज्ञासा. हम एक विशेष परिस्थिति मे क्या करे जब हमे समय दो या दो से अधिक विकल्प देता है चुनने को.  उदा. मान लीजिये, मेरी बहन अगर विपत्ति मे है किसी दुसरे शहर मे और यहा मेरा पुत्र बीमार है. अब कौनसी विपत्ति बडी है? इसका निर्णय कौन लेगा?  ये है कर्म जिज्ञासा. हम एक परिस्थिति मे कौन सा काम करे?

एक बार यह निर्णय हो जाये तो प्रश्न एक और उठता है, कि वह कर्म किया किस पद्धति से जाये? पहले का उदाहरणः लेने पर, मान लिजीये की मैने अपनी बहन की सहायता के लियी दूसरे शहर जाने का निर्णय लिया और मेरी पत्नी पर मेरे पुत्र की  देखभाल की जिम्मेदारी डाल दी. बहन के पास जा कर पता चला की उसे 15 लाख रुपियो की जरूरत है. अब 15 लाख रुपियो की व्यवस्था अपना घर बेच कर सकता हू. लेकिन तब मेरे परिवार को रहने को घर नही रहेगा. अब अगर ये रुपिये उसे अपने बच्चे की शिक्षा के लिये चाहिये तो मै घर नहि बेचून्गा , वरन् कही से लोन कि व्यवस्था करून्गा. अब अगर यही पैसे उसकी सास के ईलाज को चाहिये तो मुश्किल हो जायेगी. तब विकल्प रहेगा कि या तो अपना घर बेच दो या सास को मरने दो. अब यह  हो गयी धर्म जिज्ञासा, कि कौन सा विकल्प सही है?

सही निर्णय लेने का एक साधन है बडे लोगो के चरित्र को देखो और उस प्रकार व्यवहार करो. राजा  शिवि का उदाहरणः  ले कर अपना घर बेच दो और सास का ईलाज कर लो. अब प्रश्न यह है कि बडे लोगो ने ही कब  एक जैसा कहा  है. अनेक उदाहरणः है जहा बडे लोगो ने इससे  विरुद्ध भी कहा है. जैसे चाणक्य ने कहा "अति सर्वत्र वर्जयेत". अनेक स्थानो पर महापुरुषो ने कहा है कि सद्गुनो की भी अति अच्छी नही है .  तो इस बात का निर्णय क्या हो?

अगर मैने लाभ हानि का साधारणः  विचार किया तो मै घर नहि बेचून्गा . क्योकि मेरे बच्चो का जीवन अभी शुरु हो रह है जबकि बहन की सास अब जीवन के अन्तिम पडाव पे है. ईलाज के बाद भी वो शायद 5-7 साल और जीवित रहे. तो क्यो नहि घर बच जाये और बच्चो का जीवन सुरक्षित रहे. ये है आधिभौतिक् विचार (thinking purely from the physical realities of the world).

दूसरी विचार पद्धती हो सकती है पाप पुण्य की. अगर मैने विचार किया कि सास को ऐसे ही मरने देन जब कि मेरे पास ईलाज का साधन था, बडी पापयुक्त बात हो जायेगी. तब मेरे लिये निर्णय संभवतः हो कि घर बेचो और ईलाज करो. शायद इस नहि, तो उस जीवन मे हमे इसका फल मिले. यह है आधिदैविक विचार ( thinking from the moral and extra-physical angle).

इन दोनो के विरुद्ध् मै अगर मै ऐसा विचार करू जो सान्सारिक सुख और दुख से परे और पाप पुण्य से भी परे हो. जब मै सारी सृष्टि और खुद को एक मान कर विचार करू. जहा लाभ हानि,  सुख दुख सारी सृष्टि का संचयात्मक  योग (cumulative sum) हो, तब यह है आध्यात्मिक विचार.

अब प्रश्न यह है कि इनमे श्रेष्ट विचार पध्दति कौन सी है? इसका विचार हम क्रमशः प्रकरणो मे करेन्गे .

1 comment:

sudhir said...

COMMON MAN'S THINKING WILL BE BASED ON PURELY REALITIES OF THE WORLD.OUR DECISIONS ARE EFFECTED BY OUR PRIORITIES AND SELFISHNESS.FORGET ABOUT SISTER'S MOTHER IN LAW PEOPLE WILL THINK TWICE FOR TREATMENT OF THEIR PARENTS.BECAUSE OF THIS MENTALITY CONCEPT OF OLD AGE HOMES HAS CROP UP AND WIDELY ACCEPTED BY THE SOCIETY.