हर सुबह मा के नारन्गी आन्चल से
आसमान मे निकलकर
माथे की गोल बिन्दी सा हो जाता है.
ठेकेदार सा सबको काम बाटता है
गुस्से सी गरम दोपहर मे
सिर पे खडा मालिक सा काम कराता है.
हर शाम आसमान को विधवा सा कर
ओस के आन्सू बहाने
रातो मे सिसकता छोड जाता है.
आसमान मे निकलकर
माथे की गोल बिन्दी सा हो जाता है.
ठेकेदार सा सबको काम बाटता है
गुस्से सी गरम दोपहर मे
सिर पे खडा मालिक सा काम कराता है.
हर शाम आसमान को विधवा सा कर
ओस के आन्सू बहाने
रातो मे सिसकता छोड जाता है.
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