Friday, November 2, 2012

सूरज

हर सुबह मा के नारन्गी आन्चल से
                  आसमान मे निकलकर
माथे की गोल बिन्दी सा हो जाता है.
ठेकेदार सा सबको काम बाटता है          
                  गुस्से सी  गरम दोपहर मे
सिर पे खडा मालिक सा काम कराता है.
हर शाम  आसमान को विधवा सा कर
                   ओस के आन्सू बहाने
रातो मे सिसकता छोड जाता है.

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