Thursday, February 24, 2011

Summer

कहा है वह ग्रीष्म की तपन

कोयल का कूकना वह अमराई का बचपन
आमों पर लगी ललचाई आखें
वनो मे विचरते पैर और ख़ाक छानती बाहें
कहाँ है वह बच्चो का फुदकना
उनका कोलाहल और खिलखिला कर हँसना
वह लंबे चौड़े मिट्टी से सने मैदान
जहा बच्चो को मिलता पहला तत्वज्ञान

ग्रीष्म अब ऐयर कंडीशन मे क़ैद हैं
कोयल अब सोने के पिंजरे मे कूकती हैं
अमराई अब मॉल मे बदल गयी हैं
मैदान अब रास्ते और मकान हो गये हैं
बच्चे अब किताबों मे डूब गये हैं
शायद अब खेल के मोह से निकल गये हैं.

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