Monday, February 21, 2011

शहर

बेतहाशा रफ़्तार से दौड़ती सड़कें
फिर भी कही नही पहुचती हुई
घड़ी की सुइयों से चिपके लोग
उसी जगह बार बार चक्कर लगाते से.
पागलपन की हद तक पागल लोग
बेवजह बेबात ठहाके लगाते से.
हर कही बेशुमार आदमियों की भीड़
हर कही बाते, मुलाक़ातें, हसते रोते लोग
मै भी खो जाता हू उसी भीड मे हर सुबह
और हर शाम यहा इसी शहर मे.
मै उस समय मै नही रहता
बस हो जात हू अपने आप मे एक भीड्
बाते करता हु दिन भर किसी न किसी से
लगता है फिर भी यूँ की कुछ कहा ही नही

बिना आवाज़ के हर मौके पर
बोलता रह जाता हू पर रह जाता है कुछ बाकी.
कोई भी नही मिलता यहाँ आदमी सा
हर किसी की पहचान खो चुकी सी
शायद खुद की खुद से
बस यही शहर की दास्तां है की
यहाँ दिन का बीतना, एक और
काम निपट जाना होता है.

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