बेतहाशा रफ़्तार से दौड़ती सड़कें
फिर भी कही नही पहुचती हुई
घड़ी की सुइयों से चिपके लोग
उसी जगह बार बार चक्कर लगाते से.
पागलपन की हद तक पागल लोग
बेवजह बेबात ठहाके लगाते से.
हर कही बेशुमार आदमियों की भीड़
बिना आवाज़ के हर मौके पर
बोलता रह जाता हू पर रह जाता है कुछ बाकी.
कोई भी नही मिलता यहाँ आदमी सा
हर किसी की पहचान खो चुकी सी
शायद खुद की खुद से
बस यही शहर की दास्तां है की
यहाँ दिन का बीतना, एक और
काम निपट जाना होता है.
फिर भी कही नही पहुचती हुई
घड़ी की सुइयों से चिपके लोग
उसी जगह बार बार चक्कर लगाते से.
पागलपन की हद तक पागल लोग
बेवजह बेबात ठहाके लगाते से.
हर कही बेशुमार आदमियों की भीड़
हर कही बाते, मुलाक़ातें, हसते रोते लोग
मै भी खो जाता हू उसी भीड मे हर सुबह
और हर शाम यहा इसी शहर मे.
मै उस समय मै नही रहता
बस हो जात हू अपने आप मे एक भीड्
बाते करता हु दिन भर किसी न किसी से
लगता है फिर भी यूँ की कुछ कहा ही नही
बिना आवाज़ के हर मौके पर
बोलता रह जाता हू पर रह जाता है कुछ बाकी.
कोई भी नही मिलता यहाँ आदमी सा
हर किसी की पहचान खो चुकी सी
शायद खुद की खुद से
बस यही शहर की दास्तां है की
यहाँ दिन का बीतना, एक और
काम निपट जाना होता है.
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